बादल clouds

Posted 4/23/2015
गुमनाम बिन पहचान फिरते रहते हैं ये
कैसे अनदेखे अनसुने से घिर आते हैं ये
उबाले समंदर के नहीं बनते है ये
बिन मौसम तो कम ही दिखतें हैं ये

मुरीदों की सौ सौ गुहार सुन
कभी चंद बूँदें तो कभी बौछार बरसा जातें हैं ये
ये बादल कभी सफ़ेद नर्म रुई से
तो कभी काले धुऐं की तरह छा जातें हैं
जाने कितनी उमीदों का बोझ ले कर चलते हैं ये

अब के सावन उम्मीद लिए एक बादल मेरा भी होगा
सूरज की रोशन गर्मी को मध्धम करने का बल मुझ में भी होगा


कभी तेज़ चलने तो कभी रुख पलटने का दौर मेरा भी होगा
जम के बरसेंगे बादल जो अब तक नहीं थे गरजे
आसमान पे छाने का मज़ा कुछ और ही होगा

वक़्त के अम्बर  पे एक हमसफ़र मेरा भी होगा
अब के सावन उम्मीद लिए एक बादल मेरा भी होगा