बदलते रिश्ते

Posted 3/22/2018


नाज़ुक होतें हैं ये
सम्हाल कर इन्हें रखिएगा

रेशम की डोरियाँ हैं ये

गर तन जायें तो ज़ख़्म ही पाइएगा

क्यों कर उलझते हैं रिश्ते
सर्द शीशे से चटक जातें हैं रिश्ते
जाने कब और कैसे बिखर जातें हैं
यकायक अपने बेपरवाह हो जातें हैं

कब बचा है कोई इस रंज-ओ-ग़म से 
किसे मिलती है दवा जियें जिस के दम पे 
यारी दोस्ती प्यार वफ़ा सब बेमानी है 
बिगड़ी भली जैसी हो बस चलानी है

गाँठ पड़ी डोर तो कमज़ोर हो ही जाती है 
जुड़े आइने में दरार फिर भी नज़र आती है
नाते रिश्तों की तो बस यही कहानी है 
जो हाथ लगा वो मिट्टी जो बह गया सो पानी है