भारत गणतंत्र

Posted 1/26/2018

मेरे देश का परचम आज लहरा तो रहा है 
लेकिन इर्द गिर्द घना कोहरा सा छा रहा है 

देश की हवाएं कुछ बदली सी हैं 
कभी गर्म कभी सर्द तो कभी सहमी सी हैं 

यूँ तो विश्व व्यवस्था में छोटी पर मेरा भारत जगमगा रहा है 
पर कहीं न कहीं सबका साथ सबका विकास के पथ पर डगमगा रहा है 

स्वेछा से खान पान और मनोरंजन का अधिकार कहीं ग़ुम हो गया है 
अब तो बच्चों का पाठशाला आना जाना भी खतरों से भरा है 

सहनशीलता मात्र एक विचार और चर्चा का विषय बन चला है 
गल्ली नुक्कड़ पर आज राष्ट्रवाद एक झंडे के नाम पर बिक रहा है 

क्या मुठ्ठी भर लोगों की ज़िद को लिए मेरा देश अड़ा है 
क्यों हो की एक भी नागरिक आज इस गणतंत्र में लाचार खड़ा है 

मेरे देश का परचम आज लहरा तो रहा है 
लेकिन इर्द गिर्द घना कोहरा सा छा रहा है