भेलपूरी वाला

Posted 10/2/2018

 एक दिन की बात है

कुछ तीस बत्तीस बरस पहले की

भारी सा बैग लटकाए स्कूल के बाद

घर अपने मैं पैदल जा रहा था


खुली स्लीव ढीली टाई

राह पड़े किसी कंकर को 

अपने काले जूते का निशाना बना

धुन अपनी में चला जा रहा था

 

यकायक पीछे एक साइकल की घंटी बजी

मटमैला कुर्ता पहने एक सज्जन सवार था

जानी पहचानी सी सूरत थी उसकी 

आवाज़ में उसकी अनजाना सा प्यार था

 

“बैठो, मैं छोड़ देता हूँ बेटा” बोला वो मुस्कुराते

मेरी हिचक को भी वो भाँप रहा था

“तुमने पहचाना नहीं मुझे लगता है 

लेकिन तुम को मैं हमेशा रखूँगा याद”

 

सवाल मेरे चेहरे पे पढ़ के वो बोला

“पहले ग्राहक थे तुम मेरे

जिस दिन रेडी लगायी थी मैंने”

ये सुन याद और स्वाद दोनों लौट आए

 

सालों तलक जब कभी भी बाज़ार जाता

उसकी आँखों में वही प्यार नज़र आता 

शायद वही मिला था उसकी भेलपूरी में 

चाव से हमेशा जिसे मैं था खाता

 

सुना अब वो इस दुनिया में नहीं है 

याद कर उसको आँखों में नमी है 

कहता था सब को हमेशा कहूँगा

दुनिया की सबसे अच्छी भेलपूरी वही है