चलो... (कुछ करते हैं)

Posted 8/2/2018

चलो आज रात कहीं बैठ के पीतें हैं
कुछ पुरानी बातें कुछ रूमानी संग
भरते हैं बादलों में अपने रंग 
भूली यादों की लड़ी पिरोते हैं

याद है जब चौक पे गाड़ी रोक के 
कभी नयी कभी अध जली सिगरेट जलाते थे 
फटे स्पीकरों से ऊँची आवाज़ में गीत गाते थे 
दोस्ती की क़समें खाते थे सीना ठोक के

एक बार तो छोड़ भी आया था ना बीच राह में 
बनाया था कुछ अजीब सा ही बहाना
ख़ूब हुई मिन्नतें चला था रूठना मनाना
शब गुज़ारते हैं ऐसी ही किसी क़िस्से की बात में

चलो आज रात कहीं बैठ के पीतें हैं
कुछ अलग बातें कुछ बदले ढंग
उड़ाते है क़िस्सों की नयी पतंग 
किसी की याद में एक ताज़ा याद बनाते हैं