ड़ोर dor

Posted 4/23/2015

उम्मीद की इक ड़ोर बांधे एक पतंग उड़ चली है

कहते हैं लोग के अब की बार
बदलाव की गर्म हवाएं पुरजोर चलीं हैं
 
झूठ और हकीक़त का फैसला करने की तबीयत तो हर किसी में है
कौन सच का है कातिल न-मालूम मुनसिब तो यहाँ सभी हैं
 
सुर्र्खियों के पीछे भी एक नज़र लाज़िमी है
गौर करें तो ड़ोर की दूसरी ओर हम सभी हैं
 
अपने मुकद्दर के मालिक हम खुदी हैं