क्यों (Why)

Posted 11/15/2015

कितने आंसू अब और बहेंगे
कितने ज़ुल्म यूँ और सहेंगे

वक़्त का एक लम्हा तो
इस ख़ौफ से सहमा होगा

ऐसी वहशत को इबादत समझे जो
शायद ही कोई ख़ुदा होगा

कितने आंसू अब और बहेंगे
कितने ज़ुल्म यूँ और सहेंगे

ऐसे ज़ख्मों का मलहम कहीं तो मिलता होगा
कहीं किसी सीने में तो दिल धड़कता होगा

अब न आंसूं और बहे ये
अब न ज़ुल्म यूँ और सहें

हम सब को अब कुछ करना होगा
सब से पहले ख़ुद को
फिर ऐसी ख़ुदाई को बदलना होगा