ये जो देश है मेरा…

Posted 11/6/2015

कोई अच्छी खबर सुने तो मानो मुद्दत गुज़र गयी है
लगता है सुर्खियां सुनाने वालों की तबियत कुछ बदल गयी है

वहशियों और बुद्धीजीवियों में आजकल कुछ फरक दिखाई नहीं देता
कोई इज़्ज़त लूट रहा है तो कोई इज़्ज़त लौटा रहा है

बेवकूफियों को अनदेखा करने का रिवाज़ नामालूम कहाँ चला गया
आलम ये है के समझदारों के घरों में बेवकूफों के नाम के क़सीदे पढ़े जा रहे हैं

तालाब को गन्दा करने वाले लोग चंद ही हुआ करते हैं
भले-बुरे, ज़रूरी और फज़ूल की समझ रखनेवाले को ही अकल्मन्द कहा करते हैं

मौके के तवे पर खूब रोटियां सेंकी जा रहीं हैं
कल के मशहूरों के अचानक उसूल जाग उठें हैं

देश किसका है और किसका ख़ुदा
ईमान और वतनपरस्ती के आज लोग पैमाने जाँच रहे हैं

मैं तो अधना सा कवि हूँ बात मुझे सिर्फ इतनी सी कहनी है
क्यों न कागज़ पे उतारें लफ़्ज़ों में बहाएँ  सियाही जितनी भी बहानी है

फर्क जितने हों चाहे जम्हूरियत को हम पहले रखें
आवाम की ताक़त पे भरोसा कायम रखें

किये का सिला आज नहीं तो कल सब को मिलेगा
सम्मान लौटाने से रोटी कपडा या माकन किसी को न मिलेगा